AAFAT

आफत अपना  हो या  पराया हो,
वक़्त-ऐ -आफत का हाल है। ..... 

मामला कस्बो का हो या महफ़िल का,
आफत अपने आलम का है आखिर। ........ 

हिंसा घरो पर हो या सरहदों पर ,
रूह-ऐ -इंसान जख्म खाती है आखिर। ......... 

औरों का खेत चले या अपनों का,
जमीन जलन से तिलमिलाती है आखिर। ...... 

अस्त्र शास्त्र आगे बड़े  या  पीछे हटे ,
धरती की ही गोद सुनी होती है आखिर। ....... 

गम -ऐ -सोक का हो या जश्न -ऐ विजय का,
क़यामत पर ज़िन्दगी तड़पती है आखिर। .... 

ख़बरदार -ऐ -इंसान।।
किसी भी कु चक्र में प्रवेश न करना। ... 

आफत टलती रहे तो बेहतर है। ..... 
हम सब के घर में ,
अमन चैन बानी रहे तो बेहतर है। ..... 
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